एक लंबे समय बाद मैं सिनेमा हॉल की तरफ लौटा हूं। सिनेमा हॉल में मेरे लौटने का कारण रही फिल्म पा। पा के सिनेमा तक आने से पहले ही पत्नी का आदेश था कि इस फिल्म को हमें सिर्फ सिनेमा हॉल में ही बैठकर देखना है। घर में बैठकर डी वी डी पर नहीं। दरअसल, यह बात सच है कि फिल्म का पूरा लुत्फ उठाने के लिए सिनेमा हॉल से बेहतर कोई स्थान हो ही नहीं सकता। सिनेमा हॉल जाकर मन में यह एहसास तो हर वक्त जीवंत बना रहता है कि हां हमने फलां फिल्म को 'देखा' है। डीवीडी पर देखकर उसी 'खानापूर्ति' नहीं की है। वैसे दर्शकों का सिनेमा हॉलों से विमुख होने का प्रमुख कारण अब फिल्मों का संवदेनशील और गंभीर न-हो बन पाना भी रहा है। वो यह सोचता है कि क्यों सिनेमा हॉल जाकर बेकार ही पैसा और वक्त खराब किया जाए इससे बेहतर विकल्प तो डी वी डी है। मगर पा जैसी गंभीर और संवेदनशील फिल्म के बारे में मैं कह सकता हूं कि इसे देखने, समझने और महसूस करने का मजा सिर्फ सिनेमा हॉल में ही है।
अब थोड़ा पा पर बात करते हैं। पा संवेदनशील होने के साथ-साथ हमारे मन में प्रोजेरिया पीड़ित बच्चों के प्रति आत्मीय सम्मान रखने का जज्बा भी पैदा करती है। फिल्म बीमारी को केवल बीमारी नहीं बल्कि बीमारी के संग-साथ हंसने, गाने और शिक्षा का माध्यम भी बनाती है। बेशक औरो प्रोजेरिया से ग्रस्त है। बावजूद इसके उसमें अपनी गंभीर बीमारी से लड़ने की गजब की शक्ति है। फिल्म में औरो को कहीं अपनी बीमारी पर रोते या संताप करते नहीं दिखाया गया है। वो हर वक्त खुश रहता है। खुश रखता है। कभी खुद से तो कभी अपने भालू से बातें करता है। पढ़ाई और स्कूल उसकी इस खुशी और व्यस्तता में बराबर के हकदर हैं। मगर इस हक को मजबूती के साथ कायम रखने का जज्बा उसकी मां हर वक्त उसे देती रहती है। औरो की मां महज उसकी मां नहीं उसकी दोस्त, पिता और शिक्षिका भी है। जबकि मां इस हकीकत से बेसख्ता वाकिफ है कि औरो के संग उसका साथ केवल तेरहा-चौदहा सालों का ही है। पर वो यह हकीकत जानकर भी औरो को हर दम इस दुखद एहसास से दूर ही रखती है। शायद इसीलिए मां के दिल को बहुत बड़ा और मजबूत कहा जाता है।
हमारे समाज में एक अनविहाई मां के लिए बच्चे को जन्म देना और उसे पालना कितना बड़ा 'सामाजिक जोखिम' है, इसे हम खूब जानते हैं। बावजूद इस 'सामाजिक जोखिम' के मां औरो को जन्म देती है। एक तरह से उसके जीवन का सबसे बड़ा समर्पण औरो के रूप में हमारे सामने दिखाई देता है। इस समर्पण में यह संदेश भी निहित है कि प्रोजेरिया या अन्य किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त बच्चों के प्रति अमूमन समाज का जो नजरिया रहता है, उसे बदलना चाहिए। बीमारी का कारण चाहे जो रहे परंतु बच्चों के प्रति हीनता का भाव खत्म होना चाहिए।
बेशक, औरो तेरहा साल में अस्सी साल का दिखता जरूर है, लेकिन उसका मानसिक संतुलन सही है। वो चीजों को ठीक से देख व समझ सकता है। अपनी बात कह सकता है। आपकी बात सुन सकता है। उसकी इस बीमारी में भला वो दोषी कहां है? मैं यह बात सिर्फ औरो के लिए नहीं हर उस बच्चे के लिए कह रहा हूं, जो किसी न किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त अवश्य हैं, लेकिन पागल नहीं हैं। पागल तो हमारी मानसिकताएं हैं, जो उन्हें ऐसा मानती, समझती व देखती हैं।
पा में थोड़ा-सा राजनीति का भी पुट है। यह पुट यहां क्यों दिया गया यह तो निर्देशक ही ज्यादा बेहतर बता सकता है। पर मुझे यह राजनीतिक पुट हास्यास्पद ही लगा। अमोल (अभिषेक बच्चन) का गरीब व दलित बस्तियों में जाना ठीक वैसा ही था जैसा राहुल गांधी का जाना। गरीबों-दलितों के साथ बैठना। उनके साथ खाना। कुछ अच्छी घोषणाओं के साथ बेहतर सपने दिखाना। दरअसल, कथानक को युवा बना या दिखा देने भर से भारतीय राजनीति का चाल, चरित्र और चेहरा युवा नहीं हो जाता। मुझे उस युवा राजनीतिज्ञ का चेहरा तो औरो की उम्र से भी कहीं अधिक बड़ा लगा। हां, राजनीति की उम्र लोकतंत्र की उम्र से बड़ी जरूर हो सकती परंतु उसमें परिपक्वता और संवेदनशीलता अभी तक नहीं आ सकी है। वो अपनी बढ़ती उम्र के साथ-साथ और भी भ्रष्ट और लद्दड़ होती जा रही है। भारतीय राजनीति के तमाम युवा चेहरे औरो के चेहरे से भी अधिक 'उम्रदराज' मुझे दिखाई पड़ते हैं। यही हमारी राजनीति का 'कटु सत्य' है।
बहरहाल, पा एक बेहद संवेदनशील और विषयप्रधान फिल्म है। न सिर्फ अमिताभ बच्चन ने बल्कि फिल्म के हर कलाकार ने अपने किरदार के साथ पूरा-पूरा न्याय किया है। यह फिल्म का बड़ा पहलू है। देश में बीमारियां और भी हैं। फिल्में उन पर भी जरूर बननी चाहिए, ताकि हम बीमारी के बहाने बीमार से नफरत न करने लगें।
इस बहाने यह प्रयास भी सार्थक हो सकता है कि लोग (दर्शक) सिनेमा हॉलों की तरफ लौंटे जैसा कि मैं लौटा।
Monday, February 8, 2010
पा के बहाने
प्रस्तुतकर्ता अंशुमाली रस्तोगी पर 11:49 PM 1 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: फिल्म
Tuesday, February 2, 2010
मुझे पुरस्कार क्यों नहीं?
मैं अपनी इस शिकायत को सीधा सरकार से दर्ज करवा रहा हूं।
सरकार ने इस बार भी तमाम पुरस्कार बांटे। किसी को पद्मभूषण दिया, किसी को पद्मश्री। लेकिन इस दफा भी मुझे कुछ नहीं मिला। जबकि मेरे नाम और रूतबे को ध्यान में रखते हुए मुझे पुरस्कार मिलना चाहिए था। जब आमिर खान, रहमान, सहवाग, यहां तक कि सैफ अली खान भी पुरस्कृत हो सकते हैं तो फिर मैं क्यों और किसलिए नहीं? सरकार जवाब दे।
मैं अब सिर्फ लेखक ही नहीं रहा बल्कि 'बड़ा लेखक' हो-बन गया हूं। तमाम अखबारों पत्र-पत्रिकाओं में जमकर छप रहा हूं। लेखन के क्षेत्र से जुड़ा शायद ही कोई लेखक या साहित्यकार हो जो मेरे नाम और रूतबे से परिचित न हो! बावजूद इस घनघोर सच के सरकार का मेरे प्रति उदासीनता का रवैया मुझे परेशान करता है।
वैसे, अपना यह सच मैं कभी किसी से छिपाता नहीं हूं इसलिए आपको भी बता रहा हूं कि मेरे लेखन का उद्देश्य समाज से ज्यादा पुरस्कार हैं। मैं समाज के लिए कम पुरस्कृत होने के लिए अधिक लिखता हूं। मेरे मानना भी है कि उस 'शुष्क लेखन' का कोई औचित्य नहीं, जहां पुरस्कार या सम्मान न हो। लेखन पर मिलने, दिए जाने व छिन लिए जाने वाले पुरस्कार ही आपको बड़ा और महान लेखन बनाते हैं। लेखन में समाज को शामिल ठीक उसी तरह से किया जाना चाहिए; जैसे हमारे नेता करते हैं। पांच साल में एक बार। वो भी वोट की खातिर। यहां वोट की जगह पुरस्कार है।
देखिए, मैं लेखन के क्षेत्र में आया ही इसलिए था कि यहां-वहां से पुरस्कृत हो-हवा लिया करूंगा। मैं जब अपने से बड़े और महान लेखकों-साहित्यकारों को नियोगी-वियोगी द्वारा पुरस्कृत होते देखता-पढ़ता हूं, तो उनके प्रति मन में अथाह सम्मान जागृत होता है। पुरस्कृत होने में कभी कहीं कोई प्रगतिशील या वामपंथी विचारधारा आड़े नहीं आती। विचार से कोई लेना-देना नहीं होता। जिसने कहा कि हम आपको सम्मानित या पुरस्कृत करेंगे बस तैयार हो गए और पा गए पुरस्कार। कोशिश करनी चाहिए लेखन को पाठकों से दूर कर पुरस्कारों के नजदीक ले जाने की। लेखन का असली उद्देश्य भी यही है।
सरकार के साथ-साथ मुझे मेरे शहर की कथित साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओं से भी यह शिकायत है कि उन्होंने ने भी अभी तक मेरे नाम पर तवज्जो देने की कोशिश नहीं की है। जबकि मेरी जान-पहचान के लोग तो यहां तक कहते व मानते हैं कि प्रियंका चोपड़ा के बाद अगर बरेली शहर को पहचान मिली तो यह क्रेडिट तुम्हें भी उतना ही जाता है। एक शहर के लिए इससे बड़ी गर्व की बात और क्या हो सकती है कि उसकी पहचान का सबब मैं हूं। बावजूद इतनी खूबियों और सफलताओं के मुझे पुरस्कृत न करना यह न सिर्फ मेरा अपमान है बल्कि मेरे लेखन के साथ भी ज्यादती सरीखा है। मैं इसका पुरजोर विरोध करता हूं।
पुरस्कार के प्रति मेरी व्याकुलता को पढ़कर आप समझ गए होंगे कि मैं इसके लिए किस कदर पागल हूं। हद यहां तक है कि मेरी लिखी रचना पर अगर मुझे कहीं से कोई तारिफ नहीं मिलती तो मैं उस व्यक्ति और उस पाठक से हमेशा-हमेशा के लिए संबंध खत्म कर देता हूं। यह मेरे स्वभाव है। क्योंकि मुझे हर हाल में सम्मान और प्रशंसा ही चाहिए।
जब तमाम लेखक-साहित्यकार-कलाकार यहां-वहां से सम्मानित व पुरस्कृत हो रहे हैं तो भला मैं ही
क्यों पीछे रहूं? मैं पूरी तरह से प्रयासरत हूं कोई भी बड़ा-छोटा पुरस्कार-सम्मान पाने के लिए। अगर सरकार मेरे नाम पर तव्वजो नहीं देती तो मजबूरन मुझे सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करना पड़ेगा। आखिर यह मेरे सम्मान का मामला है।
प्रस्तुतकर्ता अंशुमाली रस्तोगी पर 8:43 PM 2 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: आईना
Thursday, January 21, 2010
संकल्पविहीन व्यक्ति हूं मैं
मैं संकल्पविहीन व्यक्ति हूं। मैं संकल्पों के साथ ज्यादा दिनों तक टिककर नहीं रह सकता। लिए संकल्पों को तोडऩा मेरी फितरत है, ठीक हमारे नेताओं की तरह। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद जिस तदाद में नेता संकल्प लेते व तोड़ते हैं, मैं भी यही करता हूं। इस या उस संकल्प को निभाने का संकल्प मैं ले तो लेता हूं परंतु ज्यादा दिनों तक चला नहीं पाता। और संकल्पों का साथ बीच राह में ही छोड़ देता हूं।
संकल्पविहीनता के मामले में मैं भी बेहद दोगले स्वभाव का हूं। आज तक जीवन में जितने भी संकल्प लिए उन्हें कभी ईमानदारी से निभाने की कोशिश ही नहीं की। हर पल इस जुगत में लगा रहता हूं कि ईमानदार संकल्प में कहां से और कैसे बेईमानी लाई जाए। अब तक न जाने कितने ही संपादकों को मैं रचना देने का संकल्प देकर बात से पलट चुका हूं। जाने कितनी ही दफा बीवी को दिए संकल्प से आंखें चुराई हैं। हर साल नववर्ष पर सिगरेट-तंबाकू छोडऩे का संकल्प लेता हूं लेकिन निभा नहीं पाता। संकल्प रात गई, बात गई जैसा हो-बन जाता है। संकल्प लो और तोड़ दो यह मेरा प्रिय स्वभाव है।
बता दूं, संकल्पों को न निभा पाने का हूनर मैंने अपने नेताओं से ही सीखा है। वाकई वे नेता महान हैं जो संकल्पों की राजनीति में माहिर होते हैं। नेता जानता है कि हमारे देश की जनता बहुत भोली है, वो उसके संकल्पों पर आसानी से विश्वास कर लेगी। यह सिर्फ हमारे देश की राजनीति में ही संभव है कि यहां संकल्पों के सहारे ही नेता जनता का वोट पा जाते हैं। जनता नेता के संकल्प की राजनीति में हर दफा गच्चा खा जाती है। जनता का गच्चा खाना नेता के लिए फायदेमंद साबित होता है।
दरअसल, यह देश ही नहीं यहां तो हर कोई केवल संकल्प की राजनीति के सहारे ही जी रहा है। आज की तारिख में सफल वही है, जो संकल्प लेना या करना तो जानता है, किंतु निभाना नहीं। आजकल के दौर में संकल्प को निभाना उतना ही कठीन है, जितना कि ईमानदार बने रहना। संकल्प को निभाने के लिए ईमानदारी चाहिए और हम अंदर व बाहर से कितने ईमानदार हैं, बताने-समझाने की जरूरत नहीं। अब तो ईमानदारी भी २१वीं सदी के इंसान के पास आने से डरती है।
असल में, संकल्प पर बदलते दौर का असर है। जिस तरह से समय बदल रहा है, संकल्प का स्वभाव भी बदल रहा है। अब संकल्प पहले की तरह न टिकाऊ रहे हैं न निभाऊ। बस यह है कि संकल्प होते हैं। उनका नाम है। अब व्यक्ति के अंदर इतनी कुब्बत ही नहीं बची है कि वो संकल्प-वंकल्प जैसा झंझट मोल ले सके। अब तो सबकुछ फटाफट का दौर है। मिनट या सेकेंड का संकल्प हो तो सही है। वरना, बहुत मुश्किल।
मुझे ऐसा महसूस होता है कि जहां संकल्प का डंडा होता है, वहां काम ठीक से नहीं हो पाते। आखिर हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं। लोकतांत्रिक राष्ट्र में भला संकल्प की अलोकतांत्रिकता का क्या मतलब? खाओ पियो और मजे करो आज के समय में संकल्प की परिभाषा शायद यही बनके रह गई है।
प्रस्तुतकर्ता अंशुमाली रस्तोगी पर 9:01 PM 1 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: व्यंग्य
Wednesday, January 6, 2010
धर्मनिरपेक्ष चोर!
चोरों से मैं हमेशा प्रभावित होता रहा हूं। अखबारों में चाहे कुछ और न पढ़ूं परंतु चोरी की वारदातें अवश्य पढ़ता हूं। चोर के चोरी करने के पहलुओं पर गहन दृष्टि रखता हूं। चोरों के अंदर कमाल का जज्बा होता है, अपने प्रोफेशन को साधने का। चोरी करना कोई हंसी-खेल नहीं। इसमें जान के साथ-साथ मान-सम्मान का भी जोखिम होता है। सबसे उम्दा बात इस प्रोफेशन से जुड़े लोगों में यह है कि ये किसी सरकारी या गैर-सरकारी संस्थान से चोरी करने का प्रशिक्षण नहीं लिए होते। जो करते हैं, अपने दम और दिमाग के बल पर करते हैं। इनका बस एक ही लक्ष्य होता है कि चोरी में सफाई का खास ख्याल रखा जाए ताकि सामने वाला ताउम्र दुविधा में ही पड़ा रहे।
चोरों में एक अच्छी बात यह होती है कि (इस पर हमारा ध्यान नहीं जाता) उन्हें बस अपने काम से मतलब होता है। चोरी की और खिसक लिए। न किसी को ज्यादा परेशान किया न किसी से सीधा मुचैटा लिया। रात के अंधेरे या सुनसान माहौल में अपने लक्ष्य को साधा और विदा हो लिए। चोर बेहद शांतिपसंद होते हैं। साथ ही, चोरों में एकता भी कमाल की होती है। एक इलाके का चोर कभी भी दूसरे के इलाके में माल साफ करने नहीं जाता। उनके इलाके उनके काम व ताकत के हिसाब से बंटे होते हैं। यहां न कोई वैचारिक न बौद्धिक टकराव होता है। सब समान विचारधारा को मानते व समझते हैं। कह सकता हूं कि चोर हमारे महान प्रगतिशील और बौद्धिक साहित्यकारों से लाखगुना अच्छे होते हैं।
प्रगतिशील साहित्यकार हर वक्त विचारधारा के अंत पर अफसोस जताता रहता है, किंतु खुद कभी एक विचारधारा पर टिक नहीं पाता।
चोर अपनी विचारधारा अपने काम व स्वभाव के अनुसार बनाते हैं। उनमें वैचारिक विघटन इसलिए नहीं होता क्योंकि लक्ष्य एक होता है। बहुत संयत और शांति के साथ वे अपने काम को अंजाम दे जाते हैं। मुझे लगता है हिंदी के समस्त प्रगतिशील व बौद्धिक साहित्यकारों को चोरों से 'विचारधारा का प्रबंधन' करना सीखना चाहिए।
चोरों के भीतर एक मुख्य बात मैंने गहनता से नोट की है। चोर जबरदस्त धर्मनिरपेक्ष होते हैं। इतने धर्मनिरपेक्ष कि नेता भी क्या होंगे! चोर चोरी करते वक्त किसी हिंदु, मुस्लिम, सिख या ईसाई का घर नहीं तलाशते। वे तो बस घुस जाते हैं। जाति व धर्म के बंधनों से मुक्त चोरी के बहाने वे अपनी धर्मनिरपेक्षता का परिचय हमें देते हैं। मैंने अपने जीवन में तमाम चोर देखे व सुने हैं, परंतु एक भी चोर मुझे ऐसा नहीं दिखा-मिला जिसकी चोरी के आड़े कभी जाति या धर्म की सीमाएं आई हों। चोर बेहद सहज होकर 'धर्मनिपरेक्ष चोरी' करते हैं। क्या आपको नहीं लगता कि यह हमारे लोकतंत्र के लिए गौरव की बात है! इतना गौरव तो हमारे देश के बड़े-बड़े नेता व साहित्यकार भी नहीं दिलवा सकते जितना कि चोर दिला देते हैं।
मुझे इस बात का बेहद अफसोस है कि हमने कभी न चोरों की विचारधारा को ढंग से समझा न उनकी धर्मनिरपेक्षता को। जबकि हमें दिल से प्रयास करना चाहिए कि हम चोरों की भावनाओं को समझें। उन्हें सम्मान दें। आखिर हम यह क्यों भूल जाते हैं कि चोर भी इंसान ही हैं।
आगे से अगर कभी आपके घर में चोरी हो तो उसे महज चोरी न समझ वैचारिक व धर्मनिरपेक्ष चोरी मानिएगा। तभी हम चोरों की चोरी करने के मकसद को जान-समझ पाएंगे।
प्रस्तुतकर्ता अंशुमाली रस्तोगी पर 8:53 PM 2 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: व्यंग्य
Wednesday, December 23, 2009
कोई झंझट नहीं समीक्षक होने में
साहित्य में एक व्यक्ति कभी खाली नहीं रहता। वह है समीक्षक। समीक्षक हर वक्त व्यस्त रहता है। किसी भी किताब पर समीक्षा लिखना उसके बाएं हाथ का खेल है। समीक्षा लिखने में उसे बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। उसके पास खाका तैयार रहता है। बस, शब्दों को ही खाके में फिट करना होता है। दरअसल, ऐसा करना समीक्षक की मजबूरी भी होती है और जरूरत भी। मजबूरी इसलिए, क्योंकि उसे समीक्षा लिखने के अतिरिक्त कोई और काम आता नहीं और जरूरत इसलिए, क्योंकि सम्मान-पुरस्कार पाने के लिए यह सब करना पड़ता है।
हिंदी साहित्य में समीक्षाएं ऐसी ही लिखी और लिखवाई जाती हैं। यह सब जानते हैं। हर लेखक-प्रकाशक का अपना समीक्षक होता है। अपने अखबार। अपनी पत्रिकाएं होती हैं। इधर किताब आई उधर समीक्षा तैयार। समीक्षक होने का सबसे बड़ा फायदा यही मिलता है कि मुफ्त की किताबें आती हैं और संबंधों को गांठने के अवसर मिलते रहते हैं। इसी गांठा-गांठी में समीक्षक दो-चार सम्मान-पुरस्कार तो ऐसे ही झटक लेता है।
प्रकाशक की सबसे ज्यादा अगर किसी से जमती है, तो वह समीक्षक ही होता है। प्रकाशक और समीक्षक के संबंध इसलिए भी मजबूत और मधुर रहते हैं, क्योंकि दोनों ही एक-दूसरे के प्रचार में समान भूमिका अदा करते हैं। प्रकाशक अपने ही समीक्षकों से समीक्षा लिखवाने का दबाव संपादकों पर बनाए रहते हैं और समीक्षक लेखक से ज्यादा प्रकाशक की तारीफ अकसर अपनी समीक्षा में किया करता है। प्रकाशक और समीक्षक के संबंधों के बीच भला संपादक की क्या औकात! वैसे संपादक भी चाहता है कि उसके पास किताबों के आने का सिलसिला यूंही बना रहे।
हिंदी साहित्य में अधिकतर समीक्षाएं लेखकिए-प्रशंसा में ही लिखी जाती हैं। बहुत ही कम (शायद न के बराबर ही) मैंने ऐसी समीक्षाएं देखी-पढ़ी हैं, जहां पर लेखक से किसी मुद्दे पर असहमति जताई गई हो। समीक्षा में असहमति कोई मायने नहीं रखती। समीक्षक होशियार होता है। वो अच्छी तरह जानता है कि लेखक की तारिफ के सहारे ही उसकी समीक्षा की दुकान चल सकती है। जहां जितनी तारिफ उतनी ही मात्र में अगली समीक्षा के लिए अनुबंध तैयार। अब कौन चिंता करता है कि ऐसी झूठी तारिफों से साहित्य या विचार को कितना नुकसान हो रहा है! बस, अपनी दुकान चलती रहनी चाहिए। साहित्य और विचार का क्या है! बंधु, वो दौर गुजर गया जब साहित्यकार साहित्य और विचार को पहले लेकर चला करता था, संबंधों को बाद में। आज जमाना संबंधों का है। साहित्य-वाहित्य तो सिर्फ अच्छी किताबों में ही सिमटकर रह गया है।
समीक्षक जन और जन-सरोकारों के पचड़ों से खुद को हमेशा दूर रखता है। उसे पचड़े पसंद नहीं। जन और जन-सरोकारों के लिए दूसरे लेखक हैं न। समीक्षक को तो मुफ्त की किताब भली और बदले में मिली रॉयल्टी। इत्तेफाक से मैं एक ऐसे समीक्षक को जानता हूं, जिनके सरोकारों का पहला और अंतिम लक्ष्य समीक्षा-लेखन ही है। समीक्षा-लेखन के अतिरिक्त न वो कुछ करते हैं, न ही सोचते। उनकी समीक्षा की दुकान में आपको हर प्रकार की मिठाई तैयार मिलेगी। बस, आप आदेश करें और मिठाई हाजिर।
बंधु. समीक्षा-लेखन सबसे सरल और विवाद-रहित काम है। आप लेखकिए-प्रशंसा में समीक्षाएं करते रहें और मान-सम्मान-पुरस्कार बटोरते रहें। आज साहित्य में समीक्षा-लेखन का यही एकमात्र उद्देश्य बना हुआ है। आप इसका फायदा उठाएं और समीक्षाओं की मिठाईंयां इस-उस संपादक को बांटते रहें। इससे प्रकाशक भी खुश और लेखक भी। दरअसल प्रकाशक और लेखक को खुश रखना समीक्षक का पहला कतर्वय होता है। इन्हीं दोनों के सहारे ही उसकी दुकान चलती है। जिस समीक्षक की दुकान जितनी बड़ी वो उतना ही सुखी। साहित्य में सुख ऐसे खोजे व हासिल किए जाते हैं। यह सब बातें बेवकूफ बनाने वाली हैं कि फलां लेखक फलां साहित्यकार दुखी है। यहां हर लेखक हर साहित्यकार सुखी और मौज में है। खासकर समीक्षक और आलोचक तो कुछ ज्यादा ही सुखी व मौज में हैं। समीक्षक समीक्षाओं में व्यस्त हैं और आलोचक आलोचना में। हर कोई हर कहीं से अपनी तरह के सुख बटोर रहा है।
मान्यवर, अगर आप समीक्षक हैं तो सुखी हैं क्योंकि इस लाइन में झंझट कम राहत ज्यादा है। तो राहतों का मजा यूंही लेते रहिए।
प्रस्तुतकर्ता अंशुमाली रस्तोगी पर 1:22 AM 3 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: व्यंग्य
Tuesday, December 15, 2009
प्रगतिशील साहित्यिक ट्रेनिंग सेंटर
मेरे साहित्यकार मित्र ने बेरोजगारों को ‘प्रगतिशील साहित्यकार’ बनाने के ताईं एक ट्रेनिंग सेंटर खोलने का फैसला लिया है। अब तक आपने इंजीनियर आदि बनने-बनाने के ट्रेनिंग सेंटरों के विषय में तो सुन-पढ़ रखा होगा, किंतु ‘प्रगतिशील साहित्यिक ट्रेनिंग सेंटर’ के विषय में पहली दफा सुनकर, थोड़ा अजीब-सा लगा होगा। मगर यह सच है।
उस दिन मित्र जब अपने नए मगर अनोखे ट्रेनिंग सेंटर का प्रस्ताव लेकर मेरे घर आए तो उत्सुकतावश मुझे उनसे पूछना पड़ा कि आखिर बेरोजगारों को ही साहित्यकार बनाने के पीछे उनका क्या उद्देश्य है? बेरोजगारों को काबिल बनाने के और भी कई रास्ते हैं, आखिर साहित्यकार ही क्यों? इतना सुन मित्र ने एक क्षण मेरी तरफ देखा और बोले, ‘मैंने इस ट्रेनिंग सेंटर को खोलने का फैसला इसलिए लिया है, क्योंकि साहित्य के क्षेत्र में राजनीति से ज्यादा संभावनाएं हैं। एक तो यहां नेताओं की तरह बात-बात पर जनता से उलझना नहीं पड़ता और अगर एक बार कलम की धाक जम गई तो बारे-नियारे।' वैसे एक बात मित्र ने बड़ी पते की कही। वो बाले, ‘साहित्य के क्षेत्र को भी आप राजनीति जैसा ही समझें। राजनीति में एक नेता होता है और हम सब उसकी जनता। साहित्य में एक साहित्यकार होता है और बाकी उसके पाठक। नेता चुनाव जीतने में धन-बल का इस्तेमाल करता है, साहित्यकार ख्याति और पुरस्कार पाने के लिए कलम और जुगाड़ का। फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि राजनीतिज्ञ को पांच साल में एक दफा जनता के बीच जरूर जाना पड़ता है, लेकिन साहित्यकार को यह सब नहीं करना पड़ता। वो तो पर्दो के भीतर रहकर भी अपनी ताकत का एहसास करवा सकता है।’
यह तो आप जानते ही हो कि कलम की ताकत के आगे अच्छा-अच्छा पानी मांगता है। अगर मामला जोड़-जुगाड़ का हो तो कहना ही क्या, फिर साहित्य के क्षेत्र में पुरस्कार पाने में देर ही कितनी लगती है। मैं मित्र को बीच में टोकते हुए बोला, 'आपका सोचना और कहना गलत है, क्योंकि साहित्य में साहित्यकार की पहचान उसकी रचना और विचराधारा से होती है। पुरस्कार तो अंततः श्रेष्ठ रचना और रचनाकार को ही दिया जाता है। प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध आदि अपनी-अपनी रचनाओं के माध्यम से ही तो जाने जाते हैं।' मित्र ने मेरी बात सुन जोर का ठहाका लगाया और मुझको विस्तार से समझाया, ‘दरअसल, अब वो प्रेमचंद, निराला और मुक्तिबोध वाले जमाने लद गए जब रचना और रचनाकार को महत्व दिया जाता था। अब जमाना जोड़-जुगाड़ का है। पहले पुरस्कार दिए जाते थे, मगर आज पुरस्कार हथिआए जाते हैं। मेरे एक कवि मित्र तो केवल दो कविता संग्रहों पर ही साहित्य का सर्वश्रेष्ठ सम्मान पा चुके हैं। उन्होंने वो सब जोड़-जुगाड़ से ही तो हासिल किया था।'
देखो मित्र, 'मैं अपने ट्रेनिंग सेंटर में कुछ ऐसे ही साहित्यकारों को तैयार करना चाहता हूं, जो रचना या विचारधारा के लिए नहीं ऊंचे संबंधों के लिए जाने-पहचाने जाएं। इससे जितना भला मेरा होगा लगभग उतना ही लाभ उन ‘बेरोजगार साहित्यकारों’ को भी मिलेगा। अरे, साहित्य-वाहित्य तो वे रचते हैं, जो इसके लिए समर्पित होते हैं या जिन्हें किसी कैरियर की दरकार नहीं होती आज जमाना कैरियरवाद का है और मैं अपने चेलों को इसी रास्ते पर ले जाना चाहता हूं।'
साहित्यकार मित्र की इस ‘बेलौस विचारधारा’ को जानकर मैं हैरान था। फिर भी उनसे अंतिम प्रश्न कर ही बैठा कि 'वे बेरोजगारों को प्रगतिशील ही क्यों बनाना चाहते हैं?' मित्र ने मुझको फिर समझाया, ‘प्रगतिशील होने का एक अलग ही मजा है। प्रगतिशील व्यक्ति केवल विचराधारा में ही नहीं जोड़-जुगाड़ में भी प्रगतिशील होता है। साहित्य में पुरस्कार या सम्मान प्रायः प्रगतिशीलों को ही तो दिए-दिलवाए जाते हैं। प्रगतिशील चिंतक आम इंसान से लेकर स्त्री और दलित तक पर बड़ा ही प्रगतिशील होकर सोचते और कहते हैं। मिसाल के तौर पर अपने राजेंद्र यादव को ही ले लो। स्त्रियों के प्रति उनका कथन और सोच कितनी प्रगतिशील है, क्या हिंदी साहित्य जगत में किसी की है ऐसी?’
मित्र की बातें मेरे कमजोर दिमाग पर अब ज्यादा ही असर करने लगी थीं। कुछ पल तक मैं मित्र की कही और समझाई जिन बातों पर अपना सिर धुन रहा था, वे अब कुछ-कुछ ‘सच’ जैसी लगने लगी थीं और मेरा मन भी इच्छा जाहिर करने लगा था कि साहित्यकार मित्र के इस ट्रेनिंग सेंटर को ज्वाइन कर लिया जाए, ताकि साहित्य के भीतर होने वाली राजनीति और कथित प्रगतिशीलों की प्रगतिशीलता का आनंद रोजगार के साथ लिया जाए।
प्रस्तुतकर्ता अंशुमाली रस्तोगी पर 11:04 PM 1 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: व्यंग्य
Wednesday, December 2, 2009
पुतला दहन क्रांति
जो महापुरुष सामाजिक मुद्दों पर ज्यादा हाथ-पैर नहीं मार पाते, वे पुतला दहनकर ही क्रांति करने में विश्वास रखते हैं। बात-बेबात पुतला दहन करना उनका शौक होता है। पुतला दहन के प्रति वे इतने चौकन्ने रहते हैं कि यहां मुद्दा उछला वहां पुतला फूंका। गाहे-बगाहे वे समाज में 'पुतला दहन क्रांति' करते रहते हैं। उनकी पुतलादहन क्रांति की खबरें जब-तब मैं अखबारों में पढ़ता हूं तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। जहां धीरे-धीरेकर तमाम सामाजिक क्रांतियां समाप्त हो रही हैं, वहां पुतला दहन क्रांति का बने रहना काफी आश्वस्त करता है। मुझे उम्मीद है तमाम क्रांतियों की भांति पुतला दहन क्रांति को भी इतिहास में अवश्य दर्ज किया जाएगा।
पुतला दहन क्रांति सामाजिक विद्रूपताओं के संग-साथ चलती है। महापुरुष हर वक्त इस खोज-खबर में लगे रहते हैं कि कब और कहां से विद्रूपता की खबर आए और वे पुतला फूंकने चौराहों पर पहुंचे। पुतलों का दहन अक्सर शहर के बीचों-बीच चौराहों पर ही किया जाता है। चौराहों पर फूंकने वाले पुतले विशेष आकर्षण रखते हैं। उनका अपना अलग महत्व होता है। पुतला दहन करते समय महापुरुष इस बात का खास ध्यान रखते हैं कि फूंका-फांकी का जश्न मीडिया कैमरों के समक्ष ही मनाया जाए। ताकि अगले दिन छपने वाली खबरों में उनके चेहरों पर पसरी 'सामाजिक क्रांति' का दर्शन हो सके। समाज और जनता यह जान-समझ सके कि सामाजिक मुद्दों के असली खैरखां बस वे ही हैं। समाज या मनुष्य के भीतर क्रांति का संचार केवल उनके पुतला दहन के माध्यम से ही हो सकता है, ऐसा वे मानते हैं।
वैसे खुद को समाजवादी बनाने का सबसे उत्तम माध्यम है; पुतला दहन। पुतला दहन करने में न जान का जोखिम है न शब्दों का। बस कपड़े या झाड़-फानूस से बना पुतला ले आइए और फूंक दीजिए। देर ही कितनी लगती है। अगर ज्यादा ही सुर्खियां बटोरने का शौक है, तो पुतले की अर्थी निकाल दीजिए। अगले दिन के अखबारों में पुतला और आप की ही तस्वीरें छाई होंगी।
सुना है कि पुतला दहन इसलिए किया जाता है ताकि बुरे को उसकी बुराईयों का आईना दिखाया जा सके। तमाम सामाजिक मुद्दों के नाम पर हम जाने कितने ही नेताओं-मंत्रियों के पुतले दहन कर चुके हैं, परंतु बुराई है कि अब भी व्यवस्था में रची-बसी है। न वो पुतले फूंककर निकल पा रही है न अर्थी निकालकर। इस उस का पुतला फूंक तो दिया जाता है, मगर आंच के ठंडा होते-होते, उसे हम भी भूल जाते और महापुरुष भी।
हां, एक जरूरी बात। दूसरों के पुतले दहन करने वाले महापुरुष अगर कभी संभव हो तो एक दफा अपना पुतला भी फूंकने की कोशिश करें, ताकि समाज में यह संदेश जा सके कि वे केवल दूसरों की बुराईंयों का ही नहीं, अपनी बुराईंयों का पुतला भी फूंकने की हिम्मत रखते हैं। पर, क्या महापुरुष इस अभियान के लिए तैयार हो पाएंगे?
प्रस्तुतकर्ता अंशुमाली रस्तोगी पर 9:25 PM 3 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
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